Friday, December 10, 2010

vidyarthi

                             विद्यार्थी 
एक दिन कक्षा में शिक्षिका ने , विद्यार्थी से प्रश्न किया -
बता तुने क्यों क्लास बंक किया ?
विद्यार्थी बोला पदने का मन नहीं था ,
सो मैंने बंक मर लिया ! शिक्षिका बोली -
अगर मैं घर पर बता दूँ तो ,
जवाब आया - बता दो , क्या  होगा ?
दो चार चांटे माँ रेगे , थोड़ी  डांट खिलाएगे 
फिर सब भूल गले से लगायेगे 
लेकिन इससे हम सुधर थोड़े जायेगे 
शिक्षिका  हकबक मुंह ताकते  देखती रही 
विद्यार्थी के होठो की  हंसी टीस देती रही ,
मन में बार बार यही प्रश्न था उमड़ रहा,
क्या यही  सपना लेकर मैंने  विद्यालय में कदम था रखा ,
दूसरे विद्यार्थी से प्रश्न किया तुमने काम क्यों  नही  पूर्ण किया ?
उधर से फेका हुआ जवाब आया 
मैंने दिया था एक को पूर्ण करने का ठेका 
परन्तु वो तो अपना भी बाप निकला 
पैसे खाए उसने मेरे  और  पतली   गली   से  बढ़ निकला 
शिक्षिका बोली  -मूर्ख ! परीक्षा उसे नही तुझे देनी है 
इसलिए कॉपी भी तूझे ही पूर्ण करनी है
विद्यार्थी बोला करूंगा की नही पता नही 
पर आप कहते है तो  इस  विषय पर सोचुगा जरूर !
अब शिक्षिका दूसरे विद्यार्थी से मुखातिब  हो बोली 
तू ने कौन से नई चाल है  खेली 
सत्तर में में से कुल दस उपस्थिति है तेरी 
आज क्या प्रिंसिपल ने भेजा था निमंत्रण
जो तुने विद्यालय में रखा है कदम 
विद्यार्थी बोला कोई निमंत्रण न मैंने पाया 
घूमने को जी  किया इसलिए आया 
शिक्षिका बोली अब आ ही गए हो तो 
जो मैं  कह रही हूँ उसे भी सुन लो 
विद्यार्थी बोला इअर फ़ोन   तो मैं  घर भूल आया 
शिक्षिका  ने सोचा  यह तो  रोज़ का नजारा  है 
छोडू इन्हे मुझे अपना कोर्स भी तो निपटाना है 
तभी पीछे   से एक आवाज़  आई 
क्या टाइम हो रहा है भाई 
सुनकर बचे हैं  दस मिनिट  अभी 
मूह  पर खीच आई सबके अजीब लकीर 
नित नए ऐसे अनुभवों से होती दो चार 
शिक्षिका सोचती रहती कैसे हो  इनका उपचार 
डांट इन्हे भाती नही हाथ सरकार चलानी  देती  नही  
प्यार से हो बर्ताव  तो सिर पर चढ़ जाते है जनाब 
डर हो जाता  है इनका मंतर  छू 
और संवार इनका भविष्य तू 
शिक्षिका मन ही  मन बुदबुदाती 
कभी उनकी शरारतों पर गुदगुदाती 
सोचती यही  तो समय है इनके मस्ताने का 
जीवन की उलझनों  से दूर भागने  का 
पर कोई के से इन्हे समझाये 
गया वक्त फिर लौट के न  आए
जिसे समझ  रहे हैं सुख असली 
असल मे वो हे नमक की डली 
पानी की बूँद पड़ते ही घुल जाएगी 
ढूंढे से भी न अपना अस्तित्व पाएगी 
इतनी सी बात इन्हे समझ न आए 
जो समझाए वही मूर्ख कहलाए 
जब रखेंगे ये जीवन के मुख्य पड़ाव पर कदम 
फिर समझेंगे कितने नासमझ थे हम 
तब न टीचर होंगे न अपने ही अपने होंगे 
जीवन पथ पर ये पूरी तरह अकेले होंगे 
सभी फलसफे पन्ने पन्ने हो हवा में उड़ते होंगे 
किसी पन्ने पर हम होंगे तो किसी पर माँ -बाप होंगे 
उनकी आँखों में सिर्फ़ आंसू होंगे 
पर उन्हें पौछने को हाथ न होंगे 
शशि  बंसल  



















   












































2 comments:

  1. tumhari avita good h..shashi

    uva kvita to bahut hi kamal ki paribhasah deti hai....i think .... y aapke hone ko ek nai pahchan deti hai.

    tumne aaj bhi kuch naya karne ka sahas hai...
    tum y kar logi.

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