सोचा था जब बूढ़ा जाऊँगा मैं ,
तब बेटों की सेवा का लाभ उठाऊंगा मैं
मेरी सोच नाजायज़ भी तो नहीं थी,
खून का एक -एक कतरा बहाया था
विरासत से निर्धन इन सुखी हड्डियों ने,
कहने को तो सरकारी महकमे में नौकर था ,
पर गुज़र-बसर हो जाये इतना ही मिल पाया था,
समझ गया था भली-भांति ये,
कम पगार की नौकरी सबसे बड़ा कलंक होती है ,
न परिवार का खर्च वहन कर पाती है ,
न समाज के बेवज़ह दस्तूरों को निभा पाती है ,
करता रहा बच्चों की उच्च शिक्षा की खातिर ,
नौकरी से बचे समय में दूसरों के यहाँ दूसरी नौकरी ,
न खुद बहुत अच्छा खा पी पाया न खिला पाया ,
जोड़ -तोड़ कर बच्चों को शिक्षित ही कर पाया ,
उनसे झूठी उम्मीदों के सहारे बढ़ता गया कर्म-पथ पर ,
हाँ ....तो बेटे बड़े भी हो गये ,!!!!!
कुछ ज्यादा ही बड़े हो गये ??????
उनकी कोई राह मुझ तक न आती थी ,
पर जिस ओर जाती थी उस ओर सिर्फ नर्क था ,
जीवन के तमाम सुखों के अभावों ने ,
उन्हें अवसाद के घेरे में धकेल दिया था ,
बहुत पीछे छूट गये थे ,जीवन की दौड़ में वे .
मैं भूल बैठा अपने बुढ़ापे और चुरा गई हड्डियों को ,
अब तक मैं बेआशना ही रहा और ताउम्र रहूँगा ,
हो चुके थे सपने सभी चूर-चूर , सामने कड़वा यथार्थ था ,
सारा प्रोविडेंट -फंड ,पेंशन से भी पूरा न हुआ ,
इसलिए कर रहा हूँ ,पिच्चह्त्तर की उम्र में भी चाकरी ,
इसलिए नहीं कि स्वयं का पेट भर सकूँ ,
इसलिए कि परिवार को पेट भर खिला सकूँ ,
बेटी के ब्याह में लिए क़र्ज़ को उतार सकूँ
बच सकूँ रोज़-रोज़ के बहुओं के तानो से
इसलिए बीबी मेरी संभालती है अब तक चौका ,
अब खून नहीं रिश्ता नसों में ,
लाचारी ,अपमान और शर्म का लाल पानी बहता है,
नए सपने,नई उम्मीद सजा सकूँ ,
इतनी जिन्दगी भी नहीं है बाकी ,
फिर भी मरने से बहुत डरता हूँ मैं ,
बेवा बीबी और भूख से तड़पता परिवार ,
मरकर भी नहीं देख सकता हूँ मैं ,
इसलिए ज़िंदा रहकर ,तिल-तिल मरता रहता हूँ मैं ,
तिल-तिल मरता रहता हूँ मै।।
तब बेटों की सेवा का लाभ उठाऊंगा मैं
मेरी सोच नाजायज़ भी तो नहीं थी,
खून का एक -एक कतरा बहाया था
विरासत से निर्धन इन सुखी हड्डियों ने,
कहने को तो सरकारी महकमे में नौकर था ,
पर गुज़र-बसर हो जाये इतना ही मिल पाया था,
समझ गया था भली-भांति ये,
कम पगार की नौकरी सबसे बड़ा कलंक होती है ,
न परिवार का खर्च वहन कर पाती है ,
न समाज के बेवज़ह दस्तूरों को निभा पाती है ,
करता रहा बच्चों की उच्च शिक्षा की खातिर ,
नौकरी से बचे समय में दूसरों के यहाँ दूसरी नौकरी ,
न खुद बहुत अच्छा खा पी पाया न खिला पाया ,
जोड़ -तोड़ कर बच्चों को शिक्षित ही कर पाया ,
उनसे झूठी उम्मीदों के सहारे बढ़ता गया कर्म-पथ पर ,
हाँ ....तो बेटे बड़े भी हो गये ,!!!!!
कुछ ज्यादा ही बड़े हो गये ??????
उनकी कोई राह मुझ तक न आती थी ,
पर जिस ओर जाती थी उस ओर सिर्फ नर्क था ,
जीवन के तमाम सुखों के अभावों ने ,
उन्हें अवसाद के घेरे में धकेल दिया था ,
बहुत पीछे छूट गये थे ,जीवन की दौड़ में वे .
मैं भूल बैठा अपने बुढ़ापे और चुरा गई हड्डियों को ,
अब तक मैं बेआशना ही रहा और ताउम्र रहूँगा ,
हो चुके थे सपने सभी चूर-चूर , सामने कड़वा यथार्थ था ,
सारा प्रोविडेंट -फंड ,पेंशन से भी पूरा न हुआ ,
इसलिए कर रहा हूँ ,पिच्चह्त्तर की उम्र में भी चाकरी ,
इसलिए नहीं कि स्वयं का पेट भर सकूँ ,
इसलिए कि परिवार को पेट भर खिला सकूँ ,
बेटी के ब्याह में लिए क़र्ज़ को उतार सकूँ
बच सकूँ रोज़-रोज़ के बहुओं के तानो से
इसलिए बीबी मेरी संभालती है अब तक चौका ,
अब खून नहीं रिश्ता नसों में ,
लाचारी ,अपमान और शर्म का लाल पानी बहता है,
नए सपने,नई उम्मीद सजा सकूँ ,
इतनी जिन्दगी भी नहीं है बाकी ,
फिर भी मरने से बहुत डरता हूँ मैं ,
बेवा बीबी और भूख से तड़पता परिवार ,
मरकर भी नहीं देख सकता हूँ मैं ,
इसलिए ज़िंदा रहकर ,तिल-तिल मरता रहता हूँ मैं ,
तिल-तिल मरता रहता हूँ मै।।
No comments:
Post a Comment