मत पूछो उस नदी का जीवन जब उसके शांत बहते जल को
रोक दिया गया अनचाहे बाँध से नियति मान स्वीकारा भी उसने
विधि का लिखा ......???????????जिस संग प्रीत लगा बैठी
आवेग के तीव्र प्रवाह से टूट गई भरभरा के............
अकेलेपन के सन्नाटे सी पथराई खामोश थी
नदी थी ,बहना था , सो बहती रही .........
पर बाँधने वाले कहाँ मानते हैं
भूल अतीत जुड़ चली नए बंधन से
निभने भी लगा था साथ दोनों का
जब कभी दरार पड़ती रिसने लगती नदी
उसके रिसने का सिलसिला अनवरत जारी है....
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