Wednesday, September 11, 2013

नियति


मत पूछो उस नदी का जीवन जब उसके शांत बहते जल को रोक दिया गया अनचाहे बाँध से नियति मान स्वीकारा भी उसने विधि का लिखा ......???????????जिस संग प्रीत लगा बैठी आवेग के तीव्र प्रवाह से टूट गई भरभरा के............ अकेलेपन के सन्नाटे सी पथराई खामोश थी नदी थी ,बहना था , सो बहती रही ......... पर बाँधने वाले कहाँ मानते हैं भूल अतीत जुड़ चली नए बंधन से निभने भी लगा था साथ दोनों का जब कभी दरार पड़ती रिसने लगती नदी उसके रिसने का सिलसिला अनवरत जारी है....

No comments:

Post a Comment