Wednesday, July 22, 2015

प्रेयसी ( लघुकथा 63 )

" ओफ्फो... ये बारिश भी न , एन दफ़्तर जाने के समय ही शुरू होती है ,पता नहीं क्या बैर है मुझसे । आज इतनी जरूरी मीटिंग है कि , अवकाश भी नहीं ले सकती ।" दीपा बड़बड़ाती बालकनी में खड़ी वर्षा रुकने की प्रतीक्षा करने लगी ।

तभी अंदर से लिखने में व्यस्त पति महोदय का आदेशात्मक स्वर कानों से टकराया , " दीपा ! समय है , तो एक प्याला चाय ही बना दो ।"

" जी ! बना देती हूँ ।" कह , मन ही मन बड़बड़ाते हुए रसोई में चली गई ।" बस जब देखो अपनी पड़ी रहती है , ये नहीं खुद गाड़ी से छोड़ आते । पर नहीं ।साहब तो लेखक ठहरे , कलम बीच में छोड़ कैसे उठ सकते हैं ? आग लगे मुई को ।"

"ये लीजिये चाय । अरे ! आप तैयार ... कहीं जा रहे हैं क्या ?"

" हाँ , अपनी कहानी की पात्रा , मेरी प्रेयसी को उसके दफ़्तर छोड़ने ।"

मौलिक व अप्रकाशित ।

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