Monday, July 27, 2015

हमें कुछ और चाहिए ( लघुकथा 69 )

" भैया , प्लीज कोई तो दया करो मुझ पर । थोड़े पैसे दे दो । मैं सब लौटा दूँगी । " कहते हुए बीच सड़क पर बैठी लड़की तड़पते हुए जोर-जोर से सिर पटक-पटक के चीखने लगी ।
" लगता है, आज फिर माँ-बाप ने पैसे नहीं दिए । "
" हाँ साहब , माँ- बाप को कमाने और पार्टी से फ़ुर्सत नहीं और उनकी इकलौती बेटी को नशा करने से ।माँ-बाप खर्चा-पानी बंद कर समझ रहे हैं , हो गई कर्त्तव्य की इतिश्री । लानत है ऐसी अमीरी पर । "
" नशे की लत ठहरी , बिना स्नेह सिर्फ़ पाबन्दी से जाती है भला ? "
" युवाओं को आपका पैसा नहीं समय , प्यार और आपसी समझ चाहिए । "
विज्ञापन का अंत इस सन्देश के साथ हो चुका था ।
शशि बंसल
भोपाल ।

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