Sunday, December 26, 2010

माँ

             
अचानक मन में  ख्याल आया ,


 क्यों न माँ पर  कविता लिखूँ  


मैंने  उठाया कागज कलम, करने लगा प्रारंभ.


तभी कलम ने पूछा?क्या लिखोगे माँ पर ? 


उसकी महिमा लिखूँगा, विराटता को उकेरूँगा,


कलम बोली, सोच लो,बहुत बढ़ी चुनौती है , 


मैं हँसा और बोला, कैसी  बात करती हो? 


कवि का काम ही है चुनौती को स्वीकारना,


ठीक है प्रयास कर देखो , अर्थपूर्ण आवाज आई ,


शुरू से अंत तक माँ के साथ का सफर, 


मैं लिखता गया , पन्ने भरते गए , भरते गए,


ज्यों ही मैंने जाँचा,कहाँ  पहुँचा जीवन के सफ़र में ,


पता चला बचपन ही जी रहा हूँ माँ के आँचल में ,


 थोड़ा  सकपकाया  , चिंतित हुआ ,


 मुझे कविता  लिखनी  है , महाकाव्य नहीं ,


क्या करूँ ? कैसे लिखूँ था इसी उलझन में अभी ,


तभी कलम थोड़ी मुसकुराई,होले से कह्कहाई,


अभी तो शुरुआत है कवि, अंत बहुत दूर है, 


 हिम्मत की और कहा, मैं पहुँचूँगा अंत तक, 


लिखते लिखते कलम फिर ठिठक गई, क्या लिखूँ , 


जीवन के हर कदम पर तो  साथ चली है,

कभी दोस्त बनी,तो कभी पिता का संबल, 

कभी हिम्मत थी,तो कभी मेरा स्वाभिमान,

चेहरे का हर दर्द बिन कहे जान लेना,  

काँटों पर चल,पंखुड़ियाँ बिछाते जाना, 

अपने होने और ना होने के संघर्ष से परे, 

मेरे अस्तित्व को सहेजने,संवारने वाली, 

जीवन के हर पड़ाव को गति देने वाली, 

गहरी नींद में एक तेज़ साँस से जागने वाली,


 हर ख़ामोशी को बिन कहे पढ़ लेने वाली, 

कलम छुटी हाथ से,सिर पकड़ कर बैठ गया, 

शायद नामुमकिन है मेरा उस पर कविता करना, 

कलम इस बार न हंसी,न मुसकुराई, 

गंभीरता से बस यूँ बढ़बढाई,  

मैं जानती थी,नासमझी कर रहे हो. 

तुम लिख रहे हो, जो तुमने जाना है,


महसूस किया है, 

परन्तु माँ सिर्फ़ यह नहीं  है,

वो धरा का अविचलित धैर्य  है , 

सूर्य का  तीक्ष्ण प्रकाश है,

समुद्र की अथाह गहराई है,

आकाश की अव्यक्त ख़ामोशी है,

एक रहस्यमय ब्रह्माण्ड को अपने भीतर समेटे,

पूरी तरह अनंता,अपरिभाषित है,

शरीर नहीं ,एक अनछुआ अहसास है,

जीवन का अविराम, संघर्ष संग्राम है,

जो उसने कहा नहीं, जो तुमने सुना नहीं,

वह भाव जो उसके अंतर्मन में रहा, 

स्वयं को खाद पानी दिए बगैर,

तुमको पुष्पित, पल्लवित करता रहा,

तुम्हारा क्या ? आज कविता करते हो,

कल नदी का दूसरा किनारा बन जाओगे.

साथ चलोगे पर लहरों को बीच ले आओगे ,


अगर चाहते हो, माँ पर कविता करना, 

तो ईश्वर से अगला जन्म नारी का माँगना,

सहना वह पीढ़ा, जो तुम्हारी


 उत्पत्ति का परिचायक है

फिर हाथ में मुझे थामके, 

उस पर कविता लिखने का दावा करना


क्यों कि एक माँ को सिर्फ़ एक माँ ही 

परिभाषित कर सकती है, 


 उस पर कविता रच सकती है. 


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