क्या शब्द दूँ मुहब्बत की इस कविता को
मेरे शब्द भी मेरी तरह मौन हैं
चाहते तो ये भी हैं बनना एक पूर्ण वाक्य
पर पूर्णता हर किसी के नसीब नहीं
फिर सवाल अपनी - अपनी संतुष्टि का है
कोई किसी को देवता बनाकर पूजता है
कोई पत्थर बना कर राह में पटक देता है
शब्द बोलना नहीं पढवाना चाहते हैं
पढने वाला अनपढ़ हो तो शब्द का क्या कसूर
होता ये भी है मुहब्बत में शशि
जीवन शब्द का रूप अख्तियार करते ही
खुद ब खुद खामोश हो जाता है
और जाते - जाते कह जाता है
शब्द खामोश न होते , तो लिपि की जरुरत क्या होती
मुहब्बत बोल सकती तो आँखों की जरुरत क्या होती

wah wah.... achchhi bhawanubhuti....
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