कन्ट्रोवर्सी एक जोंक की तरह होती है,एक बार आपसे चिपक गई तो पुरा चूस कर ही छोड्ती है .कभी ये निमन्त्रित होती है तो कभी अकारण पैदा हो जाती है.जो प्रायोजित होती है आपकी प्रसन्नता का कारण बन जाती है ,चलो मेरी प्रसिद्धि मे कुछ और इज़ाफा हुआ.पर जिनकी ऐसी मन्षा नहीं होती उनके जीवन में कभी कभी गहरी उथल-
पथल मचा देती है.
प्रिय शशि जी, फैस बुक पर आपकी प्रोफाइल देखि और ब्लॉग पर भी कुछ रचनाओं के अंश पड़े. इनमें किनारे और कंट्रोवरसी शामिल है. दोनों ही विच्रोतेजक रचनाएँ है और लगता है साहित्य की आपकी समझ या अंतर्द्रष्टि बहुत गहरी है. लिखने में मेरी भी रूचि है पर अब ज्यादातर समसामयिक अथवा विकास के बिषयों पर ही लिख रहा हूँ.
ReplyDeleteमेरी मान्यता है की सर्जन का सम्बन्ध कर्म और सामाजिक सरोकारों पर आधारित होना चाहिए , जैसा की भगत सिंह, गोर्की, प्रेमचंद्र, बाबा नागार्जुन ने या फिर फैज जैसे साहित्यकारों और किरन्तिकरिओन ने अपने जीवन में किया. कमजोर का साथ देना ही मेरा रचनात्मक धर्म है.
बहरहाल, आपके निरंतर सर्जन हेतु मेरी भी शुभकामनायें ....!
डॉ. परशुराम तिवारी,
UN development cosultant, Bhopal
Mail: drpram42@gmail.co
Mob. 9425065132