Monday, April 11, 2011

कविता

कविता क्या है तू ? मैं परचती तो हूँ तुझे ,
पर बखूबी जानती नहीं ,किस परिभाषा पर तू है खरी,
मैं कुछ कह सकती नहीं ,चुन-चुन कर लाये गये शब्दों से बनी ,
कोई छंदबद्ध रचना है तू , या सोच का निर्झर प्रवाह ,
मन का सोया भाव है तू , या अधूरी इच्छा कोई ,
अपूर्ण स्वप्न है या, फिर तू सफलता पथ की ,
समाज का रुदन है , या जीवन का उल्लास कोई ,
नही उत्तर मेरे पास , नहीं जानती मैं ,
तू क्या है?तेरा रस ,तेरा अलंकार क्या है ?
तेरी कोई परिभाषा मेरे पास  नहीं है,
तेरा-मेरा रिश्ता जो  नया-नया है ,
पर हाँ इतना अवश्य कह सकती हूँ ,
अनगिनत भावों को  समेटे ,
व्यक्त होकर भी अव्यक्त है तू ,
सब कुछ कहकर भी मौन है  ,
गीली मिट्टी की सौंधी महक है तू ,
बगिया में खिला गुलाब है .

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