मैं हूँ पतंग कागज की ,
हलके झोंके से सहम जाती हूँ .
जिस डोर् बाँध दी जाती हूँ
,ताउम्र साथ निभाती हूँ ,
लहराती,इठ्लाती उडान पाती हूँ जैसे ही ,
दुजी डोर् से काट दी मै जाती हूँ,
कपकपाते अपने वजु.द को सम्भालते हुए
सोचती हूँ आकाश न पा सकी तो क्या ?
जमी पर तो पग जमा लुँगी ,
तभी बढ़ते हैं कई हाथ झपटने को मुझे ,
और मैं तार-तार कर दी जाती हूँ ,
क्षण भर का अस्तित्व मेरा
इधर-उधर बिखर जाता है ,
हर टुकढा न जाने कहाँ गुम हो जाता है ,
मैं बोलती नहीं कभी युँ ही खामोश रहती हूँ ,
क्योंकि जानती हूँ ये ही मेरी नियति है ,
पहचानती हूँ मैं अपनी कमजोरी को ,
प्रश्न है स्वयं से ही ये मेरा ,
क्यों थामा मैने डोर् का दामन?
क्यों चाहा मैने साथ किसी का ?
जब तक नहीं सीखुंगी बिन डोर् उड़ना,
युँ ही बनते रहुंगी सबके हाथों का खिलौना .

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