बहुत आहत किया है हाथों की जकडन ने तुम्हारी ,
मैंने तो उकेरा वही, जो चाहा तुमने ,
फिर भी उपेक्षिता बनी रही मैं,
तुम्हारी लिखी इबारत बाँचते रहे सब,
सराहते रहे तुम्हारी बुद्धि कौशल को ,
नहीं समझा किसी ने मेरे संघर्ष को,
जब चाहा उठा लिया, पटक दिया यहाँ-वहाँ,
सिरहाने पर कभी, तो कभी किसी मेज़ पर,
दरी या धरा पर, कभी छोड़ दिया यूँ ही आधा सा ,
जैसे ही हुई लाचार, साथ चलने में तुम्हारे ,
फेंक आये बाहर कचरे के ढेर में ,
इधर मैं एक ढेर से दुसरे ढेर में पहुँचती रही ,
उधर तुम पायदान पर पायदान चदते रहे ,
मेरे अहसासों से दूर ,अपने अहसासों को हवा देते रहे ,
जब हम चले थे ,हमसफ़र-हमकदम बन के ,
फिर कैसे अकेले हो गये भागी तालियों के,
क्या तुम्हे नहीं लगता,जिस इबारत पर इतराते हो इतना,
मैंने तो उकेरा वही, जो चाहा तुमने ,
फिर भी उपेक्षिता बनी रही मैं,
तुम्हारी लिखी इबारत बाँचते रहे सब,
सराहते रहे तुम्हारी बुद्धि कौशल को ,
नहीं समझा किसी ने मेरे संघर्ष को,
जब चाहा उठा लिया, पटक दिया यहाँ-वहाँ,
सिरहाने पर कभी, तो कभी किसी मेज़ पर,
दरी या धरा पर, कभी छोड़ दिया यूँ ही आधा सा ,
जैसे ही हुई लाचार, साथ चलने में तुम्हारे ,
फेंक आये बाहर कचरे के ढेर में ,
इधर मैं एक ढेर से दुसरे ढेर में पहुँचती रही ,
उधर तुम पायदान पर पायदान चदते रहे ,
मेरे अहसासों से दूर ,अपने अहसासों को हवा देते रहे ,
जब हम चले थे ,हमसफ़र-हमकदम बन के ,
फिर कैसे अकेले हो गये भागी तालियों के,
क्या तुम्हे नहीं लगता,जिस इबारत पर इतराते हो इतना,
बिना मेरे उकेर पाना असंभव ही नहीं ,नामुमकिन था....
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