पलकों तले आँसुओं का समंदर छिपाए बैठे हैं,
डरते हैं कहीं झपकती पलकें साहिल न तोड़ दें.
हमने तो ताउम्र कोशिश की ,रिश्ते निभाने की,
पर हमारी वफ़ा शायद ,रिश्तों को रिश्तों को रास न आई
काश! जीवन सिर्फ कुरुक्षेत्र का एक मैदान होता ,
हार मिलती या जीत पर संग्राम एक बार ही होता.
आज 25/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर (सुनीता शानू जी की प्रस्तुति में) लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!