( १ )
दूर आकाश की छाँव तले ,सूर्य रश्मियों से भीगे हुए ,
शांत चित्त झील,मौन खड़े पेड़,
क्या भीतर से भी चुप हैं ?
या गहरी उथल-पुथल का बवंडर
उठ रहा है उनके हृदय स्थली में.
नहीं कह सकती जब तक की देख न लूँ ,
तेज़ लहरों और झोंकों के साथ चलते हुए
क्या होगा तब ? डरती हूँ , क्योंकि जानती हूँ
बहा उढ़ा ले जायेगा उनका गुबार सब कुछ......
( २ )
मैं भी तो रहने लगी हूँ चुप-चुप सी ,
मेरे अंतस में भी उठ रही हैं , तीव्रगामी लहरें,
सिर्फ इस इंतज़ार में ,
कब एक आखरी तेज़ उछाल मिले ,
और वे चीर डाले ऊपर की शांति को,
ले जाये बहा के साथ उसे भी अपने,
फिर चाहे नव सृजन हो ,या महा विनाश,
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