वक़्त की धूळ अक्सर ,रिश्तों को मलीन कर देती है
जानते हुए भी नहीं झाड़ पाते उसे ,
तह पर तह ,तह पर तह चढ़ती जाती है ,
हम दूर और दूर औsssर दूर होकर
सुदूर किनारे बनते जाते हैं ...
बीच-बीच में भावनाओं की लहरें
अहम की चट्टानें ला पटकती हैं ...
जिसके आर-पार सही-गलत कुछ नहीं दीखता ..
रूक जाते हैं दोनों ही अनचाहे पढ़ाव पर ,
पुरानी स्मृतियों की जुगाली करते हुए ,
रह जाती है तो बस अलगाव की कसक ,
एक छटपटाहट ,एक तड़प ,
अधूरे अहसास ,और झूठी उम्मीद ,सच
वक़्त की धूल अक्सर
दिलों को कठोर भी कर देती है।।।।।
No comments:
Post a Comment