माँ वो नहीं जो जन्मती है सन्तति को
वो नहीं जो पालकर लायक बनाती है
वो भी नहीं जो औलाद द्वारा
टुकड़े टुकड़े बाँट दी जाती है
माँ तो हर वो एक टुकड़ा होती है
जो रिसते घावों टूटते अरमानों के साथ
दिल पर पत्थर रख लेती है
आखों की नमी कोरों में छिपा लेती है
आँखों पर ममता का मोटा पर्दा डाल लेती है
टुकड़े टुकड़े हुए अपने अस्तित्व को
माफ़ी देके सम्पूर्ण कर लेती है
संतान और माँ दोनों भूल जाते हैं
टुकड़ों की गिनती क्योंकि
माँ गिनना नहीं चाहती और
संतान फरक नहीं कर पाती....
वो नहीं जो पालकर लायक बनाती है
वो भी नहीं जो औलाद द्वारा
टुकड़े टुकड़े बाँट दी जाती है
माँ तो हर वो एक टुकड़ा होती है
जो रिसते घावों टूटते अरमानों के साथ
दिल पर पत्थर रख लेती है
आखों की नमी कोरों में छिपा लेती है
आँखों पर ममता का मोटा पर्दा डाल लेती है
टुकड़े टुकड़े हुए अपने अस्तित्व को
माफ़ी देके सम्पूर्ण कर लेती है
संतान और माँ दोनों भूल जाते हैं
टुकड़ों की गिनती क्योंकि
माँ गिनना नहीं चाहती और
संतान फरक नहीं कर पाती....
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