सरोकार
संस्था द्वारा एक प्रतियोगिता गत दिनों आयोजित की गई थी जिसका शीर्षक था "बंधन तोड़ती बेटियाँ
और उनके समक्ष चुनौतियां " जिसमे मेरे आलेख को द्वितीय
पुरस्कार मिला...आलेख कुछ इस प्रकार था..
सामाजिक बंधन एक ऐसा बंधन है जो न तो किसी देश का संविधान है और न कानून . परन्तु है इनसे ऊपर . ये सिर्फ एक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है . धीरे - धीरे इन परम्पराओं की जड़े फैली और असीमित होती चली गई . फिर एक ऐसा समय आया कि उसके परे सोचना समाज के लिए असंभव हो गया . गौरतलब बात ये है कि इसमें जो भी परम्पराएँ व नियम बने वे सब स्त्री आधारित थे . पुरुष समाज को इससे अछूता रखा गया . इन नियमों का पालन करना लड़की के लिए आवश्यक हो गया . भले ही आज हम इक्कीसवी सदी में प्रवेश करने का दम्भ भर रहे हों ' परन्तु लड़की को लेकर समाज की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है . समाज की संकुचित पुरुषवादी सोच प्रथम तो एक लड़की को जन्म ही नहीं लेने देती ' अगर परिस्थितिवश वह पैदा भी हो गयी तो जन्म से लेकर मृत्यु तक अनगिनत बंधनों का बोझ उस पर डाल दिया जाता है ' जिसे ढोते - ढोते वह जीवित लाश बन जाती है . लड़की क्या करेगी ? कहाँ जाएगी ? किसके साथ जाएगी ? कब आएगी ? क्या पहनेगी ? कैसे बोलेगी ? कहाँ और कितना पढ़ेगी ? किस्से शादी करेगी ? नौकरी करेगी या नहीं ? ये सारे मानक समाज ने सिर्फ लड़की के लिए तय कर रखे हैं . तर्क यह कि ये सब उसकी भलाई के लिए है ' लड़की न हुई बेजान वस्तु हो गई .
अब अगर बात करें इन नियमों को तोड़कर आगे बढ़ने कि तो बदलते समय के साथ समाज ने भी करवट बदली . समाज सुधारकों , नए कानूनों की बदौलत स्त्री शिक्षा का जोर बढ़ा . समयांतर में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता से लड़कियाँ शिक्षित ही नहीं हुईं बल्कि उनमें अपनी स्वतंत्रता को जीने की इच्छा बलवती हुई , उन्हें अपनी सम्पूर्णता का ज्ञान हुआ , अपने अस्तित्व की सार्थकता भी समझ आई . उन्होंने सर्वप्रथम घर की देहरी लांघी , फिर समाज के घोषित नियमों के विरुद्ध कदम बढ़ाया . सामाजिक कुरीतियों की बेड़ियों को तोड़ने को तत्पर हुईं .
परन्तु उनका ये सफर आसान नहीं है , कदम - कदम पर चुनौतियाँ मुहँ बाये खड़ी है . वर्तमान समय नई व पुरानी पीढ़ी के बीच हो रहे परिवर्तन का भी है . पुरानी वर्जनाएँ, और मिथ टूट रहे हैं , नए आयाम बन रहे हैं . समाज दोनों की दुविधा में उलझा हुआ है , न तो वह पुराने को उगल पा रहा है , और न नए को निगल . परिणामस्वरूप लड़की जब इन सामाजिक बंधनों से परे जाती है तो प्रथम चुनौती उसके अपने परिवार से ही शुरू हो जाती है . विरोध का सर्वप्रथम स्वर यहीं से उठने लगता है , घर के बड़े - बुजुर्ग का दबाव पार कर बाहर निकलती है तो वहाँ भी उसका स्वागत खुली बाँहों से नहीं होता . बाँहें खुलती भी हैं तो स्वागत के लिए नहीं बल्कि भींचने के लिए . बात समानता की हो , आजादी की हो , बौद्धिक व मानसिक स्तर की हो , विचारों की अभिव्यक्ति की हो , शिक्षा व नौकरी की हो , या फिर पदोन्नति की . प्रत्येक क्षेत्र में उसे लड़कों से कमतर ही आँका जाता है . हर पल , हर कदम , हर दिन उसे लड़ना होता है , न सिर्फ समाज से वरन अपने अंदर उठती आक्रोश की आग से भी . उसे घर व बाहर स्वयं को मानसिक या शारीरिक रूप से सुरक्षित ही नहीं रखना होता है बल्कि अपनी सत्यता , लक्ष्य , ओए पवित्रता को भी सिद्ध करना होता है . नियमों को दरकिनार करने की सजा उसे कदम - कदम पर लाँछन के रूप में मिलती है जिससे कई बार वह निराश हो जाती है और आत्महत्या जैसा गलत कदम भी उठा लेती है . पसंद के लड़के से विवाह करने पर जो सुलूक उसके साथ होता है उसका बेहतर उदाहरण हरियाणा की खाप पंचायतें हैं . लड़की के जीवन में साँसों को छोड़कर उसका अपना कुछ भी नहीं होता , और उसे भी जब - तब रोकने की कोशिश की जाती है . वज़ह सामाजिक बदलाव अभी सतही स्तर पर ही है . लड़कियों के प्रति चिंता व बदलाव की ध्वल उज्ज्वलता एक खोखला दिखावा है , झूठ है , भ्रम है .जड़ें अभी भी अोछी मानसिकता के कीचड़ से सनी हैं .
ये तो बात रही एक पहलु की. इसका दूसरा पहलु भी है . लड़कियों में स्वतंत्रता की चाह ने उन्हें सही - गलत के अंतर से दूर कर दिया है . जिस तरह लड़कियों में क्लब , डाँस पार्टीज़ , मदिरापान आदि का चलन बढ़ रहा है उसे भविष्य में एक बहुत बढ़ी चुनौती माना जा सकता है . क्यूंकि स्वतंत्रता एवं स्वछँदता में बहुत बारीक रेखा का अंतर है . स्वतंत्रता जहाँ विकास का मार्ग प्रशस्त करती है वहीँ स्वछँदता पतन का .ये बात लड़का और लड़की दोनों पर सामान रूप से लागु होती है ....
सामाजिक बंधन एक ऐसा बंधन है जो न तो किसी देश का संविधान है और न कानून . परन्तु है इनसे ऊपर . ये सिर्फ एक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है . धीरे - धीरे इन परम्पराओं की जड़े फैली और असीमित होती चली गई . फिर एक ऐसा समय आया कि उसके परे सोचना समाज के लिए असंभव हो गया . गौरतलब बात ये है कि इसमें जो भी परम्पराएँ व नियम बने वे सब स्त्री आधारित थे . पुरुष समाज को इससे अछूता रखा गया . इन नियमों का पालन करना लड़की के लिए आवश्यक हो गया . भले ही आज हम इक्कीसवी सदी में प्रवेश करने का दम्भ भर रहे हों ' परन्तु लड़की को लेकर समाज की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है . समाज की संकुचित पुरुषवादी सोच प्रथम तो एक लड़की को जन्म ही नहीं लेने देती ' अगर परिस्थितिवश वह पैदा भी हो गयी तो जन्म से लेकर मृत्यु तक अनगिनत बंधनों का बोझ उस पर डाल दिया जाता है ' जिसे ढोते - ढोते वह जीवित लाश बन जाती है . लड़की क्या करेगी ? कहाँ जाएगी ? किसके साथ जाएगी ? कब आएगी ? क्या पहनेगी ? कैसे बोलेगी ? कहाँ और कितना पढ़ेगी ? किस्से शादी करेगी ? नौकरी करेगी या नहीं ? ये सारे मानक समाज ने सिर्फ लड़की के लिए तय कर रखे हैं . तर्क यह कि ये सब उसकी भलाई के लिए है ' लड़की न हुई बेजान वस्तु हो गई .
अब अगर बात करें इन नियमों को तोड़कर आगे बढ़ने कि तो बदलते समय के साथ समाज ने भी करवट बदली . समाज सुधारकों , नए कानूनों की बदौलत स्त्री शिक्षा का जोर बढ़ा . समयांतर में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता से लड़कियाँ शिक्षित ही नहीं हुईं बल्कि उनमें अपनी स्वतंत्रता को जीने की इच्छा बलवती हुई , उन्हें अपनी सम्पूर्णता का ज्ञान हुआ , अपने अस्तित्व की सार्थकता भी समझ आई . उन्होंने सर्वप्रथम घर की देहरी लांघी , फिर समाज के घोषित नियमों के विरुद्ध कदम बढ़ाया . सामाजिक कुरीतियों की बेड़ियों को तोड़ने को तत्पर हुईं .
परन्तु उनका ये सफर आसान नहीं है , कदम - कदम पर चुनौतियाँ मुहँ बाये खड़ी है . वर्तमान समय नई व पुरानी पीढ़ी के बीच हो रहे परिवर्तन का भी है . पुरानी वर्जनाएँ, और मिथ टूट रहे हैं , नए आयाम बन रहे हैं . समाज दोनों की दुविधा में उलझा हुआ है , न तो वह पुराने को उगल पा रहा है , और न नए को निगल . परिणामस्वरूप लड़की जब इन सामाजिक बंधनों से परे जाती है तो प्रथम चुनौती उसके अपने परिवार से ही शुरू हो जाती है . विरोध का सर्वप्रथम स्वर यहीं से उठने लगता है , घर के बड़े - बुजुर्ग का दबाव पार कर बाहर निकलती है तो वहाँ भी उसका स्वागत खुली बाँहों से नहीं होता . बाँहें खुलती भी हैं तो स्वागत के लिए नहीं बल्कि भींचने के लिए . बात समानता की हो , आजादी की हो , बौद्धिक व मानसिक स्तर की हो , विचारों की अभिव्यक्ति की हो , शिक्षा व नौकरी की हो , या फिर पदोन्नति की . प्रत्येक क्षेत्र में उसे लड़कों से कमतर ही आँका जाता है . हर पल , हर कदम , हर दिन उसे लड़ना होता है , न सिर्फ समाज से वरन अपने अंदर उठती आक्रोश की आग से भी . उसे घर व बाहर स्वयं को मानसिक या शारीरिक रूप से सुरक्षित ही नहीं रखना होता है बल्कि अपनी सत्यता , लक्ष्य , ओए पवित्रता को भी सिद्ध करना होता है . नियमों को दरकिनार करने की सजा उसे कदम - कदम पर लाँछन के रूप में मिलती है जिससे कई बार वह निराश हो जाती है और आत्महत्या जैसा गलत कदम भी उठा लेती है . पसंद के लड़के से विवाह करने पर जो सुलूक उसके साथ होता है उसका बेहतर उदाहरण हरियाणा की खाप पंचायतें हैं . लड़की के जीवन में साँसों को छोड़कर उसका अपना कुछ भी नहीं होता , और उसे भी जब - तब रोकने की कोशिश की जाती है . वज़ह सामाजिक बदलाव अभी सतही स्तर पर ही है . लड़कियों के प्रति चिंता व बदलाव की ध्वल उज्ज्वलता एक खोखला दिखावा है , झूठ है , भ्रम है .जड़ें अभी भी अोछी मानसिकता के कीचड़ से सनी हैं .
ये तो बात रही एक पहलु की. इसका दूसरा पहलु भी है . लड़कियों में स्वतंत्रता की चाह ने उन्हें सही - गलत के अंतर से दूर कर दिया है . जिस तरह लड़कियों में क्लब , डाँस पार्टीज़ , मदिरापान आदि का चलन बढ़ रहा है उसे भविष्य में एक बहुत बढ़ी चुनौती माना जा सकता है . क्यूंकि स्वतंत्रता एवं स्वछँदता में बहुत बारीक रेखा का अंतर है . स्वतंत्रता जहाँ विकास का मार्ग प्रशस्त करती है वहीँ स्वछँदता पतन का .ये बात लड़का और लड़की दोनों पर सामान रूप से लागु होती है ....
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