गाँव के प्रथम डॉक्टर का पुरस्कार ग्रहण करते हुए समीर की पनियाई आँखों में अतीत का चमत्कारी दृश्य उभर गया ।जहाँ अन्य बाल मजदूरों की तरह बिखरे अनाज को घर न ले जाकर खुली बोरियों में डालने पर वह सेठजी के कौतुहलिक प्रश्न का उत्तर दे रहा है --" सेठजी ! मैं निर्धन हूँ , चोर नहीं ।मेरा स्वाभिमान अब भी मेरे साथ है ।" उसी रोज़ से निः संतान सेठजी उसके मानस पिता बन गए थे , और अनाज बीनने वाला बच्चा आज डॉक्टर ।
( शशि )
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