Saturday, January 17, 2015

सीख --( लघुकथा - 7 )

    इस संक्रांति पर भी खिचड़ी बनाते समय माँ की सीख याद आ गई ।कहती थीं बिन्नो जब तू ससुराल जायेगी न तो ऐसी ही बनना ।इसमें सात प्रकार के अनाज मिले हैं। उन्हें छाँटकर अलग करना असंभव है ।ये अनेक रिश्तों का प्रतीक है जिससे मिलकर घर की परिभाषा पूरी होती है ।जब इसमें गुड़ पड़ता है तो स्वाद मीठा हो जाता है ।तू भी जुबान में हमेशा वही मीठास रखना ।घी डालकर ये पूर्णता प्राप्त करती है तू भी जरा से छौंक से बिना डरे रिश्तों में चिकनाई रखना ।माँ की सीख जीवन में ऐसी उतारी आज मुझे स्वयं नहीं पता मैं कौन सा अनाज हूँ ।
( शशि बंसल )

No comments:

Post a Comment