वह जितना निर्धन था उसके सपने और महत्वाकांक्षाएं उतनी ही बड़ी थीं चाय का ठेला ही उसकी आजीविका थी ।दिन हो या रात , सर्दी हो या गर्मी वह अपना काम मुस्तैदी से करता चौबीसों घंटे , सिर्फ यही सोचता एक दिन जब मैं कुछ बन जाऊँगा तो इस काम को सदा के लिए अलविदा कह दूँगा । अपने स्वप्नों को पूरा करने की लिए रात घर भी नहीं जाता क्योंकि सड़क के दूसरे ठेलों से आती रौशनी से उसकी पढ़ाई की बाधा तो दूर होती ही दो - चार ग्राहक भी अतिरिक्त आ निकलते । और यूँ उसकी परीक्षा फीस का बंदोबस्त भी हो जाता ।एक दिन जब उसने जाना वह क्लेक्टरी की परीक्षा में सफल हो गया है तब से हाथ का चाय का गिलास रखकर जो भागा आज तक नहीं लौटा । प्रतीक्षा करती चाय कब की ठंडी हो चुकी थी इससे अनजान कि अब वह कभी गर्म नहीं होगी क्योंकि उसके भीतर की गर्मी तो उस लड़के ने ले ली थी ।
( शशि )
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