Thursday, January 8, 2015

ब्रेन वाश --( लघु -कथा)


रमा का ब्याह हो रहा था रिश्ता कुछ खास पसंद तो नहीं आया था पर जानती थी कि उसकी यानि लड़की की पसंद नापसंद के कोई मायने नहीं , सो नियति मान स्वीकार लिया और अपने स्वप्नों के राजकुमार की जगह अपने पति को दे सारे अरमान उसी से बाँध दिए ।फेरों के बाद जैसे ही ससुराल में पहला पग धरा लगा मानों , धरती ही हिल गई दूसरा पग उठाना मुश्किल होने लगा ।समझ गई , नियति ने भी दगा कर दिया उससे ।वो ऐसे मुहाने पे आ खड़ी थी जहाँ न आगे गत थी न पीछे ।कोई चारा न था सिवा उस अग्नि कुण्ड में कूदने के । ब्याह के चार रोज बाद जो छोड़ के गया उसके छः माह बाद पति ने आके सूरत दिखाई ।गर्म जलते तवे पर पड़ती पानी की बूंदों से भीग बौरा गई ।बोली इस बार हमें भी साथ ले चलो तुम्हारे बिना मन नहीं लगता यहाँ । तमतमाया पति बोला अकेली कहाँ हो ? सब तो हैं घर में । अकेला तो मैं रहता हूँ ।तुम इसी तरह ब्रेन वाश करोगी तो आइन्दा नहीं आऊँगा यहाँ ।तब से पत्नी चुप है भीड़ में अकेली , चार बच्चों को संभालती अक्सर सोचती है - ब्रेन वाश किसका हुआ है उसका या पति का ।
( शशि)

No comments:

Post a Comment