Monday, March 30, 2015

साँझ (लघु कथा -26 )

"राधा की माँ... सुनती हो ? उम्र की ढलती साँझ है पता नहीं कब ऊपर वाला हमे अकेला कर दे । कभी तो घड़ी दो घड़ी पास आके बैठ जाया करो । जब देखो काम में लगी रहती हो ।"
" हूँ .. जानती हूँ तभी तो ...।पर शायद आप भूल गए कि हम इसलिए साथ हैं वरना कभी के ....।
( शशि )

No comments:

Post a Comment