नहीं , कभी नहीं जीत पाऊँगा मैं ।एक एक कर सभी सफल हो बादल बन इतरा रहे हैं और मैं अभी पहली सीढ़ी पर ही रुका हूँ ।क्या करूँ ? एक हाथ महत्त्वाकांक्षाओं को मुट्ठी में भींचे चढ़ने को आतुर है , तो दूजा संस्कारों की धरोहर थामे जमीन छोड़ने को तैयार नहीं ।
(शशि )
(शशि )
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