Tuesday, April 7, 2015

अंतर्द्वंद्व ( लघु कथा 31 )

नहीं , कभी नहीं जीत पाऊँगा मैं ।एक एक कर सभी सफल हो बादल बन इतरा रहे हैं और मैं अभी पहली सीढ़ी पर ही रुका हूँ  ।क्या करूँ ? एक हाथ  महत्त्वाकांक्षाओं को मुट्ठी में भींचे चढ़ने को आतुर है , तो दूजा  संस्कारों की धरोहर थामे जमीन छोड़ने को तैयार नहीं ।
(शशि )

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