Tuesday, May 26, 2015

नायक ( लघु कथा 48 )

प्रणय में डूबे किशोर के मस्तिष्क में मनीला के शरीर से लिपटी कई आकृतियाँ यकायक उभर आईं , एक साथ अनेक गंध नथुनों में भरने लगी , घृणित भाव लिए वह झटके से उठ बैठा ।
" तेरा दिमाग ख़राब हो गया है जो बलात्कार पीड़िता से विवाह कर नायक बनने चला है ।अबे ! सड़क पर निकलना तो दूर एक कमरे में रहना मुश्किल हो जायेगा ,समझता क्यों नहीं है ? ये सब 'फिल्मों' में ही ठीक है ,असल जिंदगी में नहीं ।" किशोर को मित्रों का कहा याद आने लगा ।
" तुम्हारे मन में क्या चल रहा है , भली भांति समझ रही हूँ किशोर ।पर इस पल मैं किस मानसिक यंत्रणा से गुजर रही हूँ , कैसा महसूस कर रही हूँ , क्या तुम समझ रहे हो ? "
" हम्म ! समझ रहा हूँ , जिंदगी चलचित्र नहीं है ।"
" ये क्यों नहीं कहते - " मैं ही नायक नहीं ।"
शशि

No comments:

Post a Comment