Friday, May 15, 2015

प्रतिच्छाया -( लघुकथा 47)


  " अरी ओ गृहस्वामिनी ! यूँ रोज-रोज क्यों टुकरा करती हो मुझे ? "
" हा हा ! कुछ नहीं री ।बस तेरे - मेरे बीच का फ़रक खोजती हूँ ।"
" कुछ खोज पाईं ? "
" कहाँ री ! मैं तो तेरी ही प्रतिच्छाया निकली , जो तिल-तिल सुलग रही है ताकि लौ जलती रहे , अँधेरा जाता रहे । "
( शशि )

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