एक पाती माँ के लिए ..
प्रणाम माँ !
आज मातृ दिवस है ।इस सुअवसर पर हर बार की तरह दुविधा में हूँ कि तुझे क्या भेंट करूँ ? आज जो कुछ भी मेरे पास है वह सब तेरा ही दिया हुआ है ।मेरा रोम-रोम , मेरी साँसे सभी तो तेरी कर्जदार है माँ ।तूने मुझे अपने रक्त से सींचकर गड़ा है ।अपने अमृतपान , लोरियों से मीठी नींद सुलाया है तो कभी मान-मनुहार से जगाया है ।मेरे बढ़ते क़दमों को सही दिशा देने के लिए कभी डाँटा तो कभी सखी बन समझाया भी है । तूने मुझे खुले आकाश में उड़ने के लिए पंख दिए ।तेरे अथक परिश्रम से ही मेरा अस्तित्व आकार ले पाया है ।मैं तो तुझे विरह भी भेंट नहीं कर सकती माँ , तूने तो वह भी कन्यादान करते समय भीगे नेत्रों और मधुर मुस्कान के साथ दे दिया था मुझे ।अब तुम ही बताओ माँ ! मैं कब तक तुमसे लेती ही रहुँगी ? क्या ऐसा नहीं हो सकता माँ सिर्फ आज के लिए तुम मैं और मैं तुम बन जाएँ ।जानती हूँ कि तुम्हारी उम्र भर की तपस्या का कर्ज एक दिन तो क्या कई जन्मों में भी नहीं उतरेगा ।पर इससे मेरे मन को तुम्हारे लिए कुछ कर पाने की थोड़ी तसल्ली अवश्य हो जायेगी ।तुम्हारे सामने ये सब कहती तो तुम मुझे अपनी प्रशंसा में कुछ कहने ही नहीं देती इसलिए लिख कर पूछ रही हूँ ।कहो न माँ ! मेरी ये बात भी मानोगी न प्लीज़ ...।
उत्तर की प्रतीक्षा में
तुम्हारी बेटी ।
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मौलिक एवम् अप्रकाशित
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प्रणाम माँ !
आज मातृ दिवस है ।इस सुअवसर पर हर बार की तरह दुविधा में हूँ कि तुझे क्या भेंट करूँ ? आज जो कुछ भी मेरे पास है वह सब तेरा ही दिया हुआ है ।मेरा रोम-रोम , मेरी साँसे सभी तो तेरी कर्जदार है माँ ।तूने मुझे अपने रक्त से सींचकर गड़ा है ।अपने अमृतपान , लोरियों से मीठी नींद सुलाया है तो कभी मान-मनुहार से जगाया है ।मेरे बढ़ते क़दमों को सही दिशा देने के लिए कभी डाँटा तो कभी सखी बन समझाया भी है । तूने मुझे खुले आकाश में उड़ने के लिए पंख दिए ।तेरे अथक परिश्रम से ही मेरा अस्तित्व आकार ले पाया है ।मैं तो तुझे विरह भी भेंट नहीं कर सकती माँ , तूने तो वह भी कन्यादान करते समय भीगे नेत्रों और मधुर मुस्कान के साथ दे दिया था मुझे ।अब तुम ही बताओ माँ ! मैं कब तक तुमसे लेती ही रहुँगी ? क्या ऐसा नहीं हो सकता माँ सिर्फ आज के लिए तुम मैं और मैं तुम बन जाएँ ।जानती हूँ कि तुम्हारी उम्र भर की तपस्या का कर्ज एक दिन तो क्या कई जन्मों में भी नहीं उतरेगा ।पर इससे मेरे मन को तुम्हारे लिए कुछ कर पाने की थोड़ी तसल्ली अवश्य हो जायेगी ।तुम्हारे सामने ये सब कहती तो तुम मुझे अपनी प्रशंसा में कुछ कहने ही नहीं देती इसलिए लिख कर पूछ रही हूँ ।कहो न माँ ! मेरी ये बात भी मानोगी न प्लीज़ ...।
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मौलिक एवम् अप्रकाशित
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