Wednesday, July 22, 2015

समझौता ( लघुकथा 65 )

"अरे गंगू बाई तू ! आज बेटी को नहीं भेजा ? क्या हुआ उसे ? और तेरी आँखे इत्ती क्यों सूज रही हैं ?"
"क्या बताऊँ बीबी जी , आप दो दिन को मायके क्या गई , इधर बड़ा अनर्थ हो गया ।"

"क्या अनर्थ हो गया ?"

"वो...आपके पीछे से साहब अपनी बेटी जैसी छोरी पर भी ललचा गए मालकिन । भला हो ईश्वर का कि बड़ी अनहोनी टल गई ।छोरी भाग आई ।पापी पेट का सवाल है मालकिन । गिने-चुने घर हैं इस मौहल्ले में ।सब ओर शिकारी घात लगाये बैठे हैं । पेट देखें तो इज्जत पर बन आती है , इज़्ज़त देखे तो पेट पे ।"

" घर तो दोनों ही जले हैं , गंगूबाई !अब घाव सहलाना है , या नमक डालना । हमे ही तय करना है ।ये ले , कुछ रुपये रख , काम आएँगे । और हाँ , किसी और घर में ये बात न करना । आखिर तेरी बेटी की इज़्ज़त का भी सवाल है । "

असमंजस में पड़ी गंगू रूपये थामे चली गई ।

मौलिक व अप्रकाशित ।



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