Wednesday, July 22, 2015

अहम् ( लघुकथा 66 )


" देखिये !आजके समाचार पत्र में छपी मेरी पहली रचना ।आपके सान्निध्य में, मैं भी थोड़ा बहुत लिखना सीख गई हूँ ।"
" हुम्म... लिखना सीख गयी हूँ । ये मुँह और मसूर की दाल ।जाओ, पहले जाकर खाना लगाओ ।बहुत जोरों की भूख लगी है ।"
" जी....।मुझे लगा था आप प्रसन्न होकर प्रशंसा करेंगे ।"
" कर तो चुका हूँ ,हजारों बार , कि खनकती कलाइयों में बेलन ही सजता है ,कलम नहीं ।"
" ठीक कहते हैं जी ! एक ही आकाश में उड़ान भरती दो पतंगों में से कमजोर डोर का कटना तो तय है ।"
शशि

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