बस और नहीं .. ( लघुकथा )
कुछ काम से कमरे में आई तो देखा , उसका पति सूटकेस में कपड़े जमा रहा था , हैरान हो उसने पूछा ," कहीं बाहर जा रहे हैं ? मुझे कुछ बताया भी नहीं ? यूँ अचानक .. आखिर बात क्या है ? "
" ....................... "
" मैं कुछ पूछ रही हूँ , जवाब क्यों नहीं देते । "
" तुम्हें नहीं लगता संगीता तुमने कुछ पूछने में बहुत देर कर दी । "
" देखो , बच्चों के खाने का समय हो रहा है । फिर मिन्नी की अधूरी पड़ी नई ड्रेस भी सिलना है और बेटू कह रहा था , उसके सिर में दर्द है तो मालिश कर दूँ , सो अभी मेरे पास बहस करने का समय और इच्छा दोनों ही नहीं है , बेहतर होगा कि आप बिना पहेलियाँ बुझाए जाने का कारण और जगह दोनों बता दें । "
" पहेली तो मैं बन गया हूँ सग्गू ... । खाली वक्त में कहने वाली । और वो खाली वक्त तुम्हारे पास मेरे लिए कभी होता नहीं । मुझसे बात करने की भी समय सीमा निर्धारित कर रखी है तुमने ।बच्चों के प्रति अतिरिक्त प्रेम समझ सकता हूँ , पर खुद को अतिरिक्त बनता और नहीं देख सकता .... बस ।"
मौलिक व अप्रकाशित ।
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