Thursday, September 24, 2015

परच ( लघुकथा 73 )


परच ( लघुकथा 73 )
बच्ची उस अज़नबी की गोद में तेज़-तेज़ रोये जा रही थी ,और हाथ से उसके सीने को धक्का दे नीचे उतरने को मचल रही थी । पर वह था कि उसे उतारने को ही तैयार न था , बल्कि कसके ताबड़-तोड़ चूमे जा रहा था । यह देख पास ही खड़ा उसका मित्र भावुक हो गया ।उसने मित्र को दिलासा देने के लिए कंधे पर हाथ रख समझाया , " मत रो मेरे यार , तू उसे घुटनों के बल छोड़ गया था ।इतनी जल्दी परच नहीं पायेगी तुझे ।"
" हूँ , नहीं जानता था यार , भारत माँ को सच्चा सपूत होने का होने का परिचय देते - देते खुद की बेटी की नज़रों में पिता की परच खो बैठूँगा । "
शशि बंसल
भोपाल ।

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