Thursday, September 24, 2015

विभ्रम ( लघुकथा 80 )


विभ्रम ( लघुकथा )
चित्र आधारित प्रतियोगिता के लिए

बस गंतव्य की ओर बढ़ रही थी कि प्रथम सीट पर बैठे दो व्यक्ति अचानक हरक़त में आ गए ।एक ने ड्राइवर की कनपटी पर बंदूक टिका बस को जंगल की ओर मोड़ने का आदेश दिया तो दूसरे ने सभी यात्रियों से कीमती सामान उतारकर देने को कहा , साथ ही फ़रमान जारी कर दिया कि बस के जंगल में पहुँचते ही सिर्फ पुरुष यात्री ही बस से उतरेंगे । अपने भविष्य की दुर्गति सोच महिला सवारी सकते और दहशत में आ गईं । तभी पास खड़ी पुरुष सवारियों ने आपस में कुछ इशारे किये और धीमे से उन बंदूक धारियों के पास पहुँच गए ।कायर और मूक भीड़ के आदी बदमाशों को संभलने का मौका ही नहीं मिला और वे पीटकर लस्त-पस्त हो गए । हर्ष के अतिरेक में एक महिला सवारी ने जब उन वीरों को धन्यवाद कहना चाहा तो उनमें से एक बोला - " मेडम धन्यवाद तो तभी मिल गया था , जब सीट न मिलने की वज़ह से पास खड़े होने पर आपने पलट के शंकित नज़रों से हमें डांटा था । "
शशि बंसल
भोपाल ।

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