Friday, December 17, 2010

शब्द

                                 शब्द


क्या शब्द दूँ मुहब्बत की इस कविता को 
मेरे शब्द भी मेरी तरह मौन हैं
चाहते तो ये भी हैं बनना एक पूर्ण वाक्य
पर पूर्णता हर किसी के नसीब नहीं
फिर सवाल अपनी - अपनी संतुष्टि का है
कोई किसी को देवता बनाकर पूजता है
कोई पत्थर बना कर राह में पटक देता है
शब्द बोलना नहीं पढवाना  चाहते हैं
पढने वाला अनपढ़ हो तो शब्द का क्या कसूर 
होता ये भी है मुहब्बत  में शशि 
जीवन शब्द का रूप अख्तियार करते ही 
खुद  ब खुद खामोश हो जाता है 
और जाते - जाते कह जाता है 
शब्द खामोश न होते , तो लिपि की जरुरत क्या होती 
मुहब्बत बोल सकती तो आँखों की जरुरत क्या होती 

1 comment: