आज मेरे कारण माँ के सभी स्वप्न शाख से अलग हुए पत्तों की शक्ल में दहकते अंगारों की तरह उदास बिखरे पड़े थे।क्योंकि उसके लाख समझाने पर भी मैंने गलत मार्ग छोड़ अपने दोनों भाइयों की तरह सुरभित, सम्मानित जीवन- लक्ष्य पूर्ण नहीं किया था। दूरस्थ रिश्तेदारों ने तो अपनी हरी भरी जिंदगी का हवाला दे मुझ परगामी , कुबुद्धि को अलग करने को कहा भी पर माँ पुत्र -मोह त्याग नहीं पाई।वह खुद से ही शिकायत करती " जब तीनों को पालने वाली गोद एक ही है तो फिर परवरिश के रंग अलग -अलग क्यों ?" पर उसे जवाब नहीं मिलता।मैं मूर्ख जवानी की रंगीनियों में ऐसा खोया कि खुद तो परिवार के लिए कलंक बना ही , मेरे कुकर्मों के कारण आज मेरे भाई भी हाशिये पर आ गए और माँ तीन -तीन पुत्रों के होते हुए भी रीती रह गई ।
( शशि )
( शशि )
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