घोर नैराश्य के दौर में उसने मेरे जीवन में कदम रखा।पहली ही मुलाकात में वह बहुत भा गई । मैंने उसे अपने साथ रखने का फैसला कर लिया।उसके जीवन में आते ही सब कुछ अच्छा लगने लगा ।वह भी मुझसे बहुत प्यार करने लगी ।हम साथ खाते ,साथ खैलते ,साथ घूमने भी जाते ।हाल ये हुआ कि जब घर से निकलता तो वह द्वार तक छोड़ने आती , उसकी आँखे मेरा पीछा ओझल होने तक करती रहतीं ।वापस आता तो पता नहीं कैसे मेरे पदचाप सुन लेती ।द्वार तक पहुँचूँ इसके पहले वह ढेर सारी मुहब्बत लिए द्वार पर खड़ी मिलती ।मेरे लिए उसके बिना जीवन की कल्पना करना दुःस्वप्न था ।परंतु नियति शायद हम दोनों के प्यार से खुश नहीं थी तभी एक खुशनुमा शाम को साथ घुमते वक्त अचानक वह मेरे हाथ से फिसलकर कार की चपेट में आ गई और मुझे सदा के लिए अलविदा कह गई । मित्रों ,मेरी जिंदगी को फिर वीरान कर जाने वाली उस प्रेमिका का परिचय देना तो मैं भूल ही गया । वो प्रेमिका थी मेरी प्यारी कुतिया "डिम्पी " ।
( शशि )
( शशि )
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