Thursday, January 8, 2015

ऐश कर रही है .......(लघुकथा)


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पांच बजे उठ हड़बड़ाते हुए दूध, चाय ,पानी, बर्तन, लंच आदि निबटा तैयार हो दरवाज़े की ओर बढ़ी ही थी कि छह वर्षीय मुन्नू आँचल पकड़ कहने लगा "माँ जल्दी आना ।" घड़ी देखी आज फिर लेट हो गई थी ।बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेर" हाँ जल्दी आ जाऊँगी "कहते हुए उसे ताले में बंद कर फ़टाफ़ट भारी मन से सीढ़ियाँ उतर गई ।बेटे की हर शनिवार की छुट्टी मेरे लिए किसी उम्र कैद से कम न थी । हर पल हज़ार मौत मरना थी ।ख़ैर जरूरतों के आगे माँ भी हार जाती है और उसके बच्चे भी उम्र से पहले समझदार और बड़े हो स्वयं को हर नियम में ढाल लेते हैं।ऑफिस में भी मन कहाँ लगता वो तो बेटे में ही अटका रहता ।पता नहीं क्या कर रहा होगा इस वक्त ।टिफ़िन खोल के खा भी पाया होगा कि, नहीं ।कहीं टेबल से गिर विर कर चोट न लगा बैठा हो वगैरह वगैरह .....। परिणामस्वरूप काम में हज़ार गलतियाँ और फिर बॉस के सामने पेशी ।पर उस सब की आदत हो गई थी उसे ।लौटते समय भी कभी कोई बिल भरना होता तो कभी कोई।दूध, फल, सब्जी ,बेटे के पसंद की आइसक्रीम आदि आवश्यक वस्तुएँ दो- दो पैसे की चिक चिक कर खरीद जब घर पहुँचती तो अक्सर मुन्नू सोफे या जमीन पर खिलौनों के बीच औंधे मुँह सोया मिलता।उसका मटमैला मुँह उसके घंटों रोने की गवाही देता ।झट से उठा ताबड़तोड़ प्यार की बरसात करती जाती, आँसू अनवरत टपकते जाते ,दिल बस बाहर आकर गिरता नहीं ।और कानों में रिश्तेदारों के शब्द गर्म पिघले शीशे से बहते रहते ..." अरे उसका क्या है, पति आधे दिन बाहर रहता है , अकेली है , नौकरी करती है, खूब ऐश कर रही है ........!!!!!!!
(शशि)

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