Sunday, February 8, 2015

कुर्सी (लघु कथा 10 )


"ए सुन ! पंचायत के चुनाऊ में ये कुर्सी तुम साले अछूतों के लिए पक्की कर दी ससुरों ने। तू खड़ा हो जा।चुनाव का रुपया पैसा हम खरच कर देइ  ।पर उके बाद पलट के देखियो मती ।"
"ए सरपंच भूल गवा क्या ? आज तनखा का दिन है  जा , जल्दी तियार हो अँगूठा छापने चलना है  ।"
"चल जा बे ,बड़ा आया सरपंच कहीं का .. ला सबरे रुपे दे इते और ये ले ....सौ रूपे रख ।जाके दारु पी लियो ....और सुन कल मेरा आदमी कछु कागज लेके आएगा चुपचाप ठप्पा लगा दियो ।"
( शशि )

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