Saturday, February 21, 2015

कलुषित बचपन ( लघु कथा - 13 )


"अब बहुत हो गए तेरे नखरे ।आज तो तुझे बताना ही होगा कि हर बार विवाह से इनकार करने का क्या कारण है ? आखिर कब तक मायके में बैठे रहेगी ?"
धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर वह जमीन पर बैठ गई ।उसकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली ।अपने आप से घृणा होने लगी।अनायास ही उसके हाथ तेजी से शरीर को साफ़ करने लगे ,जैसे अभी हाल ही कीचड़ से निकली हो और पूरा शरीर कीचड़ के दाग से सन गया हो ।कैसे बताये वह माँ को ? उसका रूढ़िवादी परिवार जहाँ बेटी किसी बोझ से कम नहीं ,कहाँ सहन कर पायेगा इस कलुषित सत्य को कि उनकी बेटी तो कम उम्र में ही अपनों द्वारा डरा-धमकाकर बड़ी कर दी गई थी ।
(शशि)


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