Saturday, February 21, 2015

आचरण (लघु कथा - 14 )


तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सर्वश्रेष्ठ समाज सुधारक किन्नर का अभिवादनीय सम्बोधन चल रहा था ...
" बहुत शिकायतें हैं कि समाज हमसे सामान्य व्यवहार नहीं करता, उचित स्थान नहीं देता ,पर कभी सोचा है हम समाज को क्या देते हैं ? फिकरे कसने को प्रेरित करने वाला लुभाता श्रृंगार ,आकर्षित करने वाली अदाएँ , ताली पीट -पीटकर नेग के रूप में वसूली गई मोटी रकम अश्लील हरकतें और न जाने क्या क्या...।माना प्रकृति पर हमारा वश नहीं पर व्यवहार और आचरण पर तो है, क्यों कृत्रिम आचार व्यवहार से स्वयं साबित करें कि हम सामान्य नहीं हैं ..... शब्दों की गूँज के बीच सभी उपस्थित किन्नर विचार मग्न हो गए ।
( शशि )

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