पिचकारी की दुकान से कुछ दूर खड़ा बालक हसरत भरी निगाह से एक पल रंगीन पिचकारियों को देखता तो दुसरे ही पल हाथ के सिक्कों को गिनने लगता , जैसे बार बार गिनने से पैसे दुगुने हो जाएँगे ।जितने रंग दुकान की पिचकारी के थे , उससे कहीं अधिक उसकी मासूम आँखों में दिखाई दे रहे थे । बेबस बचपन देखा नहीं गया तो मैंने उसके पास जाकर उसेअपनी पसंद की पिचकारी खरीदने को कहा।शायद उसे मेरी सहायता में दया दिखाई दे गई ।जिसे उसके ज़मीर ने सिरे से ख़ारिज़ कर दिया।मुझे उसकी आँखों में होली के रंग जलते हुए स्पष्ट दिख रहे थे ।
( शशि )
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