Thursday, March 12, 2015

आतंकवाद - 20 ( विषयाधारित लघु कथा )


नाटक का आखिरी दृश्य।पिता,भाई, पति के रूप में मंच पर खड़े तीन पुरुष और उनके सामने आँसु बहाती प्रश्न कर रही नायिका.
" आतंकवादी कौन है ? वही न.. जो बेकुसूर लोगों को मारता है, कभी ज़ेहाद के नाम पर ,तो कभी और किसी नाम पर ।पर क्या सिर्फ मार दिया जाना ही मरना है ? साँस हों और अहसास मार दिए जाये कभी समाज के नाम पर ,तो कभी रीति-रिवाजों के नाम पर ,तो वह मरना नहीं होता ? खून बहे तभी उसे आतंक कहेंगे ? स्वप्नों को बह जाना आतंक नहीं ? "
(दर्शकों को संबोधित करते हुए )
" सड़क पर हुआ आतंक तो सबको दिखाई देता है पर जो खून हर रोज़ हर पल घरों में हम पर होता है यदि उसे रोक दिया जाये तो शायद बाहर का आतंक स्वमेव ही समाप्त हो जाये ।"
( शशि )

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