Monday, March 30, 2015

बहरूपिया ( लघुकथा -28 )

उसकी गन्दी निगाहें बहुत दिन से चुन्नी पर थीं ।जब उसे पता चला इस बार के जुलूस में चुन्नी को हनुमान बनाया जा रहा है तो वह सबको धोखा दे स्वयं राम का भेस धारण कर पहुँच गया , ये सोचकर कि इतनी लीपा पोती के बाद कोई नहीं पहचान पायेगा कि वह कोई और है ।
" पवन सुत हनुमान की जय ।"
" मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जय ।"
" मर्यादा..  पुरु..षो..त्तम " जैसे उसके दिमाग पर हथौड़े सा पड़ा ।वह तो आज अपनी घिनौनी मानसिकता से मर्यादा ही नहीं इंसानियत भी तार तार करने वाला था । पर एन वक्त कांधे पे रखे धनुष की प्रत्यंचा से छूटा तीर उसके हृदय को भेद भीतर के राम से टकरा गया था ।
( शशि )




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