Sunday, April 5, 2015

अर्धांगिनी ( लघु कथा 29 )


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किस रिश्ते की बात करती हो नीरू ? हमारा रिश्ता तो वैसे भी सिर्फ सतही है। रिश्तों की बुनियाद प्यार और समर्पण तो हमारे बीच है ही नहीं ।हूं... कितना मूर्ख था मैं भी ....जो तुमसे झूठी उम्मीदें लगा बैठा.... इंतज़ार ही करता रहा..... पर तुम कभी मेरी मुश्किल घड़ी में मेरे पास खड़ी नहीं हुई ।कैसे भूल जाऊँ उस दिन को जब मेरे बुरे वक्त में तुम सारा सामान समेट बिना कुछ कहे मायके चली गई थीं , मुझे मेरी ही बेटी से बात नहीं करने देती थीं और जब संवाद भी किया था तो तलाक के नोटिस के साथ ।नीरू... पुरुष कभी कमजोर नहीं होता पर पत्नी अक्सर उसके प्यार को उसकी कमजोरी समझ लेती है ।बार बार परीक्षा लेती है उसकी सहन शीलता की।नारी होने का अतिरिक्त लाभ ले समाज के आगे अपने को लाचार साबित करती है।हर बार पत्नी दोषी नहीं होती तो हर बार पति दोषी कैसे हो सकता है ?खैर मैं तुमसे ये सब क्यों कह रहा हूँ ? तुम्हारा अहंकार तो आज भी कम नहीं हुआ । तुम आज यहाँ इस वक्त इस घर में हो तो इसलिए नहीं कि मैं तुमसे हार गया हूँ या तुम जीत गई हो। बल्कि इसलिए कि मैं अपनी पुत्री की नजरों मेँ एक गैर जिम्मेदार पिता नहीं बनना चाहता । यदि रिश्ते सच्चे हों तो वहाँ हार -जीत नहीं होती सिर्फ प्यार और भरोसा होता है । नीरू.... रिश्तों के दरकने की आवाज़ नहीं होती पर जब ये टूट के जुड़ते हैं तो गाँठ अवश्य पड़ जाती है , हम लाख चाहे तो भी सब कुछ पहले जैसा नहीं हो सकता ।आज हम भले ही एक छत के नीचे हों पर साथ कभी नहीं हो सकते । मुझे ताउम्र इस बात का दुःख जरूर रहेगा कि तुम पत्नी तो बन गई पर मेरी अर्धांगिनी नहीं बन पाई .... अर्धांगिनी नहीं बन पाई ....
( शशि )


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