Sunday, April 5, 2015

निर्भया ? (लघु कथा- 30 )

जालीदार विक्षिप्तालय की बेड़ियों में जकड़ी आक्रोशित , वसनहीन निर्भया के अचेतन मस्तिष्क मैं बैठा भय रह रह कर भयंकर दौरों की शक्ल में बाहर आ जाता ।डर की तीव्रता इतनी अधिक होती कि वो भोजन -पानी देने आये माँ बाप को भी अपना दुश्मन समझ मारने को दौड़ पड़ती ।प्रकाश की एक हलकी सी किरण की छुअन भी वह बर्दाश्त नहीं कर पाती ।ऐसे में जब तमाम न्यूज़ चैनल उसके नाम के स्थान पर निर्भया शब्द प्रयोग करते तो माँ बाप का कलेज़ा चीख कर कह उठता -"आओ आकर देखो , कितनी निर्भया है हमारी बेटी ? 
(शशि )

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