Tuesday, April 14, 2015

हक़ ( लघु कथा - 34 )

मंच पर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पुरूस्कार ग्रहण करती शिक्षिका की पुत्री को देख दर्शक दीर्घा में बैठी काज़ल के नेत्र छलछला गए । माँ के पूछने पर उसने कहा - " द्रोणाचार्य आज भी जिन्दा है माँ ।"
( शशि )

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