Monday, April 27, 2015

झूठी तसल्ली ( लघुकथा 40 )

डायरी 
25.4.2015
" आज मैंने आशु को बहू से कहते सुना - " बहुत हो गई बाबूजी की खिट - खिट ।मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता ।मैं आज ही किसी वृद्ध आश्रम का पता पूछता हूँ ।" 
छः साल का था जब सीमा छोड़ के गई थी ।तब उसके मासूम चेहरे की छवि मन मस्तिष्क में ऐसी बसी कि आज तक उसके चेहरे में वही मासूमियत देखता रहा।मैं उसी दिन से पिता और माता दोनों बन गया था ।कभी कभी खुद भी हैरान हो जाता था अपने भीतर की स्त्री को देखकर । शायद इसी रूप ने आशु को माँ की कमी कभी महसूस नहीं होने दी । जवानी के दिन जीवन - यज्ञ में होम कर दिए ।ताकि उसका भविष्य संवर जाये ।
तमाम संघर्ष , अनुभव , एकाकीपन की पीड़ा सफेदी और झुर्रियों के ढेर में तब्दील हो लाचार कर गई फिर भी लड़खड़ाते कदम दोबारा बच्चा बन पोतों के पीछे दौड़ने को आतुर थे , बहू में मातृत्व ढूँढ़ते थे ,काँपते हाथ पुत्र को लाठी बना पकड़ना चाहते थे , पर पुत्र ने तो हाथ बढ़ाने से ही इनकार कर दिया। शायद मेरी आँखों पर सफल पिता के विश्वास का काला पर्दा पड़ा था इसीलिए पुत्र की कुटिलता और मासूमियत में भेद नहीं कर पाया ।
सोचता हूँ , मैंने एक ही जीवन में पुत्र के लिए इतने असल रूप धरे , काश ! वह मेरी खुशी के लिए अच्छा बेटा होने का एक मुखौटा ही पहन लेता । "
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( शशि )

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