बचपन ही से उस दीवार को खेत के किनारे पाया , इसलिए आत्मीयता होना लाज़िमी था ।वह भी रोज़ सबेरे प्रतीक्षारत महसूस होती और मुझे देख मुस्कुरा देती ।आये दिन रंगीन विज्ञापनों से श्रृंगारित हो मौन आमंत्रण देती ।जब भरी दोपहरी में थक उसकी गोद में सिर रखता , तो आँचल की छाँव कर देती ।
पहली बार आज उसे उदास पाया ।नज़रें उसके काले श्रृंगार पर ठहर गईं ।पर उसमें आमंत्रण नहीं विरह का भाव था । " भूमि अधिग्रहण बिल किसान हितैषी है ।" ओह्ह ! मेरी पीढ़ा उस तक पहुँच चुकी थी । गले लग रो पड़ा - " मैं अकेला कहाँ हूँ पगली ! तू है न मेरे साथ ।"
शशि
पहली बार आज उसे उदास पाया ।नज़रें उसके काले श्रृंगार पर ठहर गईं ।पर उसमें आमंत्रण नहीं विरह का भाव था । " भूमि अधिग्रहण बिल किसान हितैषी है ।" ओह्ह ! मेरी पीढ़ा उस तक पहुँच चुकी थी । गले लग रो पड़ा - " मैं अकेला कहाँ हूँ पगली ! तू है न मेरे साथ ।"
शशि
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