Friday, May 15, 2015

परया घर ( लघु कथा 46 )


" स्साली...।ज़ुबान चलाएगी मेरे सामने ।" तड़ाक । तड़ाक ।
" बस , बहुत सह लिया ।मैं जा रही हूँ माँ के घर ।"
" जा .. जा ...। दोबारा कदम भी मत रखना मेरे घर में ।"
" मेरे घर में " शब्द परिचित अवश्य थे , पर उसकी चुभन पहली बार महसूस हुई ।पति में पिता का चेहरा उभर आया ।
उसने स्वयं को माँ की जगह खड़े पाया ।
" घर तो माँ का भी नहीं है ।"
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( मौलिक व अप्रकाशित )

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