Sunday, June 7, 2015

स्वामिभक्त ( लघुकथा 52 )


" राज ! इन बैसाखियों को छोड़ क्यों दिया ? "
" क्योंकि हमें इनकी जरुरत जो नहीं ।अब से हम ही एक-दूजे की बैसाखी हैं । "
" हाँ राज ! पर देखो न ...ये तो हमारे ही पीछे आ रही हैं ।"
" वहीं रुको ! अब तुम्हारी जरुरत नहीं ।"
" क्या चाहते हैं मालिक ? हम भी स्वार्थी बन जाएँ ।हम जान चुकी हैं थामने वाले हाथ कभी भी छूट सकते हैं , और किनारों का छूटना कितना आहत करता है , उपयोगितावादी लोग क्या समझें ?
शशि

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