दूर खड़ी मैं उसका करुण रूदन देख रही थी । लगता था जैसे वर्षों से भीतर आहिस्ता-आहिस्ता जमा ताप आवेग पा फट पड़ा हो । हृदय के घाव एक-एक कर पिघलते हुए स्पष्ट दिख रहे थे , जिसकी टीस और तपिश ने वतावरण को भी तपा दिया था ।मुझे उसका यौवन याद आ गया , जब वह भूगर्भा लहराती हरियाली का श्रृंगार किये सोना उगलती थी , परंतु स्वार्थ के अंधे पुत्रों ने श्रृंगार छिन उसे विधवा ही नहीं बनाया बल्कि पूरी तरह नोंच कर कोख़ भी बंज़र कर दी ।आज उसी रत्न गर्भा का क्रोध चरम पर था ।
माँ ..... पुत्र की आवाज़ से मेरी तन्द्रा भंग हो गई ।अचानक रुदन भी बंद हो गया । 'माँ ' शब्द की ध्वनि ने उस पर शीतल जल का काम किया ।मुझे देख मुस्कुराते हुए बोली-
" माँ हूँ न ! मुझे विगत भूल क्षमा कर देना चाहिए ।कोख़ सूनी हो गई तो क्या ? सुलाने को गोद तो है । मैं अपने पुत्रों के घरौंदों को तो गोद मे सजा ही सकती हूँ ।"
उसके आंसुओं की नमी हृदय के भीतर उतर शुष्क ज़मीन को तर कर गई , उसकी कोख़ भर चुकी थी ।बच्चे माँ की नाल से फिर जुड़ चुके थे ।
शशि
No comments:
Post a Comment