" हम फलों से जरा लदे नहीं , हर राह चलता पत्थर फेंकना शुरू कर देता है । सिर्फ इसीलिए क्योंकि हम राह पर अनाथों के तरह फल-फूले हैं ।"
" हाँ भाई ! ठीक कहते हो । यदि हम भी किसी बाग़ की शोभा होते तो नाज़ों में पलते , ठाठ से रहते ।पत्थर की कोई छुअन हम तक नहीं पहुँच पाती ।"
"अजीब विडम्बना है , परवरिश गुलशन में मिले तो कीमत लाखों की , सरे राह क्या जन्मे ,बेमोल ही हो गए ।"
" हुँ...। गोया कि बाग़ से इतर हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं । "
युवा पेड़ों के वार्तालाप को सुन पास खड़ा बूढ़ा वृक्ष बोल पड़ा - " काश ! इस विडम्बना का शिकार सिर्फ हम वृक्ष ही होते । "
शशि
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