Thursday, September 24, 2015

वक्ती रिश्ते ( लघुकथा 74 )


वक्ती रिश्ते ( लघुकथा )
----------------------------------
"सुनिये, चार दिन से माँ के घर से न किसी का फोन आया और न किसी ने मेरा फोन उठाया। भैया और पापा के मोबाइल भी स्विच ऑफ हैं। किसी अनहोनी की आशंका से दिल बैठा जा रहा है," मधु ने भीगे स्वर में पति से कहा तो वह स्नेहिल स्वर में बोले, " तो हम चल कर देख आते हैं न ! घंटे भर में पहुँच जाएँगे , बल्कि तुम्हें तो अक्सर उनके साथ ही होना चाहिये। " पति ने कहा।
रास्ते भर मधु सोच में गुम रही कि कैसे एकदम व्यवसाय में घाटा हुआ और सबका मनोबल टूट गया। सब तथाकथित अपनों के आगे उन्होंने मदद के लिये हाथ फैलाये पर वे छिटक कर दूर हो गये...और उनकी बेबसी के चर्चे नमक -मसाला लगा कर इधर-उधर करने लगे.....बस वह और उसके सहृदय पति ही उनके साथ खड़े थे , पर उनकी सहायता ऊँट के मुख में जीरे की तरह ही साबित हो रही थी।
माँ के घर पहुँच कर मधु ने दरवाजे पर दस्तक देनी चाही तो वह यूँ ही खुल गया...उढ़का हुआ जो था और..और भीतर पहुँच कर उसकी चीख निकल गई...माँ-बाऊजी भैया-भाभी और नन्हीं मुन्नी सब चित्त पड़े थे। पति ने उन सबकी नब्ज़ देखी और कहा," मधु ! सब खत्म ! "
वह पथराई आँखों से देख रही थी कि अधमरी वो पाँच जानें आज मरण की रस्म भी अदा कर चुकी हैं।
" रिश्तेदारों को फोन तो कर दूँ ," कहते हुए पति ने मोबाइल निकाला तो वह पागलों की तरह चिल्लाई, " मैं किसी मतलबी और कमीने रिश्तेदार की छाया तक इन पर नहीं पड़ने दूँगी। पुलिस की कार्यवाही के बाद इनका दाह-संस्कार होगा और मुखाग्नि मैं दूँगी। कोई और कर्मकांड नहीं होगा....मातमपुर्सी भी नहीं और शोक सभा भी नहीं । नहीं चाहिये मुझे कातिल और वक्ती रिश्ते।"
-------------------------------------------------
शशि बंसल
भोपाल ।

No comments:

Post a Comment